About The Conference


“श्रीमद्भगवद्गीता : परम्पराएँ और प्रभाव – वैश्विक संस्कृतियों का समन्वय”
“Srimadbhagavad Gita: Traditions and Influence, Bridging Cultures across the World”

The Srimadbhagavad Gita is an enduring source of inspiration for resolving the inner conflicts of human mind and comprehensively understanding the fundamental purpose of the life. The gradual decline in the spirit of Lokasangraha—the welfare and collective well-being of society—in public life is at the root of growing discord among different cultures and nations. In contemporary global society, the teachings of the Srimadbhagavad Gita, particularly Karma Yoga, Samadarshita (impartiality), Sarva-Bhuta-Hita (welfare of all beings), Samatva (equanimity), and Atma-Samyama (self-restraint), assume renewed significance providing a meaningful foundation for fostering mutual understanding essential for bridging cultures across the world.

The Tradition of the Gita and Indian Philosophy

The Srimadbhagavad Gita is the essence of Indian philosophical thought enunciated in the Vedas, Upanishads and the Yoga tradition. Lord Krishna tells Arjuna that he first revealed this knowledge to the Sun-god who imparted it to his son Vivasvan Manu who in turn, imparted it to Ikshvaku. Thus received through an established succession, this knowledge was known to the royal sages. With the passage of time, however, this tradition had become obscured, and Lord Krishna says therefore Arjuna, I reveal it to you once again.

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥
(Bhagavad Gita 4.1–2)

The teachings of the Bhagavad Gita have reverberated through the ages, inspiring diverse interpretations within the Indian philosophical tradition. From Adi Shankaracharya, Ramanujacharya, Madhvacharya, Nimbarkacharya and Vallabhacharya to modern thinkers such as Swami Vivekananda, Lokmanya Tilak, Mahatma Gandhi and Sri Aurobindo, numerous scholars and thinkers have interpreted the Bhagavad Gita from their respective philosophical perspectives.

The Influence of the Srimad Bhagavad Gita
The Srimad Bhagavad Gita has profound influence on Indian philosophy, religion, literature and culture. Its teaching of Karma Yoga prevents the individual from falling into inaction; Jnana Yoga cultivates wisdom and discernment; Bhakti Yoga leads towards devotion, surrender and compassion; Samatva provides mental equilibrium; and Lokasangraha connects the individual with social responsibility.

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
(Bhagavad Gita 2.47)

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
(Bhagavad Gita 2.48)

लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि।
(Bhagavad Gita 3.20)

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
(Bhagavad Gita 3.21)

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
(Bhagavad Gita 6.5)

These principles provide timeless guidance for good governance, and responsible public life. The dialogue between Lord Krishna and Arjuna addresses a larger human crisis. The global relevance of the Bhagavad Gita rests upon the universality of the human questions it addresses:

What is one's duty? What is the relationship between action and its consequences? How can one attain freedom from suffering? How should ethical decisions be made? How can the mind be controlled?
These questions are not confined to any single religion, society or culture.

For Mahatma Gandhi, the Gita served as a pillar of moral strength; for J. Robert Oppenheimer, it became a source of reflection on scientific responsibility; for Lokmanya Tilak and Dr. A. P. J. Abdul Kalam, it offered inspiration for selfless action and national welfare; for Ralph Waldo Emerson and Henry David Thoreau, it became a source of literary inspiration; and for Hermann Hesse and Aldous Huxley, it provided a foundation for philosophical contemplation. The extraordinary strength of the Srimadbhagavad Gita lies in its ability to enter into dialogue with different generations according to their circumstances. It has continued to influence humanity across time and will continue to do so.

In the words of Dr. A. P. J. Abdul Kalam:

“The teachings of the Gita are timeless and eternally relevant.”

The Gita and Global Harmony
The Srimad Bhagavad Gita serves as an important cultural bridge between Indian tradition and global modernity. Within contemporary cultural discourse, its integrative message may be understood in terms of respect for one's own cultural identity accompanied by tolerance and respect for the identities of others.

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
(Bhagavad Gita 3.35)

The celebrated ideal of “Vasudhaiva Kutumbakam”, meaning “The world is one family,” originates in the Maha Upanishad. The Bhagavad Gita's teachings of Sarva-Bhuta-Hita and Samadarshita resonate deeply with this broader Indian worldview.
The Gita states:

सर्वभूतहिते रताः।
(Bhagavad Gita 5.25)

which inspires to expand our thinking beyond an exclusively human-centred perspective towards a broader vision of the well-being of all living beings.

About the Conference

The Srimadbhagavad Gita occupies an exceptionally significant place in the Indian knowledge tradition. This conference seeks to bring the universal and timeless principles of human welfare enshrined in the Srimadbhagavad Gita onto the global platform, thereby encouraging reflection, contemplation and dialogue among the cultures of the world.

श्रीमद्भगवद्गीता मानव जीवन के मूल अर्थ और सार्थकता को समग्र दृष्टि से समझने का अद्वितीय आधार व चिरस्थायी प्रेरणा-स्रोत है। भारतीय परम्परा में समाहित श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धान्तों ने समय-समय पर विश्व के दार्शनिक, साहित्यिक और आध्यात्मिक चिंतन को प्रभावित कर उसे एक सार्थक दिशा प्रदान की है। वर्तमान वैश्विक समाज में व्याप्त अव्यवस्था, बढ़ते उपभोक्तावाद व प्रखर प्रतिस्पर्धा के बीच सार्वजनिक जीवन में लोकसंग्रह की भावना का क्रमशः क्षीण होना स्पष्ट रूप से परिलक्षित है। ऐसे परिदृश्य में विभिन्न संस्कृतियों, समुदायों और राष्ट्रों के मध्य बढ़ते असामंजस्य को दूर कर पारस्परिक सद्भाव स्थापित करना अत्यंत जटिल किन्तु वैश्विक शान्ति के लिए अनिवार्यतः आवश्यक है। प्रस्तुत वैश्विक परिस्थितियों में श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मयोग, समदर्शिता, सर्वभूतहित, समत्व एवं आत्मसंयम जैसे सिद्धान्त पहले से अधिक प्रासंगिक हैं, जिनके माध्यम से वैश्विक सांस्कृतिक समन्वय की अवधारणा को रूपांकित किया जा सकता है।

गीता की परम्परा और भारतीय दर्शन

श्रीमद्भगवद्गीता वेद, उपनिषद एवं योग-परम्परा में विभिन्न रूपों में प्रवाहित भारतीय चिंतन का सरल, स्पष्ट और समन्वित स्वरूप है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि इस योग शास्त्र को मैंने सर्वप्रथम सूर्य को कहा, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु को व वैवस्वत मनु ने इक्ष्वाकु से कहा। इस प्रकार परंपराओं से प्राप्त हुआ यह योग शास्त्र लुप्तप्राय है जिसे मैं तुम्हें पुनः कह रहा हूं। यथा-

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।। — भगवद्गीता 4.1-2

भारतीय दार्शनिक परम्परा में गीता को प्रस्थानत्रयी के एक प्रमुख अंग के रूप में स्वीकार किया जाता है। उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता—इन तीनों ने भारतीय दार्शनिक व वेदान्तीय चिंतन को आधार प्रदान किया। भारतीय दार्शनिक चिंतन में गीता के अध्ययन की परम्परा अत्यन्त व्यापक रही है। आदि शंकराचार्य से लेकर रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्कचार्य, वल्लभाचार्य तथा आधुनिक युग में स्वामी विवेकानन्द, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी और श्री अरविन्द, तक अनेक चिन्तकों ने अपने-अपने दार्शनिक दृष्टिकोण से गीता की व्याख्या की है।

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रभाव
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय ज्ञान-परम्परा की वह जीवंत धारा है जिसने सहस्राब्दियों से भारतीय दर्शन, धर्म, साहित्य और संस्कृति को प्रभावित किया है। गीता का कर्मयोग व्यक्ति को निष्क्रियता से बचाता है; ज्ञानयोग उसे विवेक प्रदान करता है; भक्तियोग उसे समर्पण और करुणा की ओर ले जाता है; समत्व उसे मानसिक संतुलन देता है और लोकसंग्रह उसे सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ता है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।— भगवद्गीता 2.47
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। — भगवद्गीता 2.48
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि। भगवद्गीता 3.20
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। भगवद्गीता 3.21
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।- भगवद्गीता 6.5

यह सिद्धान्त आधुनिक नेतृत्व, प्रशासन, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में अत्यन्त प्रभावी हैं। भगवान् कृष्ण व अर्जुन के बीच संवाद व्यापक मानवीय संकट को संबोधित करता है तथा प्रतिकूल परिस्थितियों में ज्ञानपूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करने की प्रेरणा देता है।

गीता का प्रभाव धार्मिक क्षेत्र से कहीं अधिक व्यापक है। इसमें निहित जीवन-दर्शन ने विश्वभर के दार्शनिकों, राजनीतिज्ञों, वैज्ञानिकों और साहित्यकारों के चिंतन एवं दृष्टिकोण पर गहन प्रभाव डाला है। गीता की वैश्विक प्रासंगिकता का आधार उसके सार्वभौमिक मानवीय प्रश्न हैं। मनुष्य कौन है? उसका कर्तव्य क्या है? कर्म और परिणाम का सम्बन्ध क्या है? दुःख से मुक्ति कैसे मिले? नैतिक निर्णय कैसे लिया जाए? मन को कैसे नियंत्रित किया जाए? ये प्रश्न किसी एक धर्म, समाज या संस्कृति तक सीमित नहीं हैं।

गीता गांधीजी के लिए नैतिक शक्ति के स्तंभ के रूप में, ओपेनहाइमर के लिए वैज्ञानिक दायित्व पर चिंतन के स्रोत के रूप में, लोकमान्य तिलक व डॉ. अब्दुल कलाम के लिए निष्काम कर्म और राष्ट्रकल्याण की प्रेरणा के रूप में, एमर्सन और थोरो के लिए साहित्यिक प्रेरणा के रूप में, हेसे और हक्सले के लिए दार्शनिक चिंतन के आधार के रूप में, तथा सुनीता विलियम्स द्वारा अंतरिक्ष तक साथ ले जाए गए आध्यात्मिक संदेश के रूप में सतत सहचर रही है।

श्रीमद्भगवद्गीता में यह अद्भुत क्षमता है कि वह अलग-अलग युगों और पीढ़ियों से उनकी परिस्थितियों के अनुरूप संवाद स्थापित कर मानवता को प्रभावित करती रही है और करती रहेगी। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के शब्दों में—

“गीता की शिक्षाएँ सर्वकालिक एवं सदैव प्रासंगिक हैं।”

गीता और वैश्विक सांस्कृतिक समन्वय
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय परम्परा और वैश्विक आधुनिकता के बीच एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक सेतु है। इसका समन्वयकारी संदेश हमें यह स्मरण कराता है कि वैश्विक संस्कृति की वास्तविक शक्ति विविधताओं के विनाश में नहीं, बल्कि विविध परम्पराओं के संवाद, सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान में है। गीता की दृष्टि इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि वह व्यक्ति को अपने स्वधर्म के अनुरूप कर्म करने की प्रेरणा देती है—

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। भगवद्गीता 3.35

इसे आधुनिक सांस्कृतिक विमर्श में अपनी सांस्कृतिक पहचान के सम्मान और दूसरों की पहचान के प्रति सहिष्णुता के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
“वसुधैव कुटुम्बकम्” का प्रसिद्ध भाव महोपनिषद् से सम्बन्धित है तथा गीता की सर्वभूतहित और समदर्शिता की शिक्षाएँ इसी व्यापक भारतीय विश्वदृष्टि के साथ संवाद स्थापित करती हैं। गीता में कहा गया है—

सर्वभूतहिते रताः।- भगवद्गीता 5.25

अर्थात् जो सभी प्राणियों के हित में संलग्न रहते हैं, वे उच्च आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त करते हैं। यह विचार आधुनिक विश्व में मानव-केंद्रित दृष्टि से आगे बढ़कर सर्वभूत-कल्याण की दिशा में चिंतन विकसित करने में सहायक हो सकता है।

सम्मेलन की परिकल्पना

भारतीय ज्ञान-परम्परा में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान अत्यन्त विशिष्ट है। यह सम्मेलन भारतीय अध्यात्म एवं गीता की शिक्षाओं को वैश्विक शैक्षिक विमर्शों के परिप्रेक्ष्य में प्रतिष्ठित करते हुए, अंतरसांस्कृतिक नैतिकता, अध्यात्म तथा तुलनात्मक दर्शन के क्षेत्र में सार्थक योगदान देकर अकादमिक संवाद को समृद्ध करने की अपेक्षा रखता है। इसका उद्देश्य श्रीमद्भगवतद्गीता के सार्वभौमिक व सर्वकालिक मानव कल्याण के सिद्धांतों को वैश्विक पटल पर रखते हुए विश्व संस्कृतियों में चिंतन, मनन व संवाद स्थापित करना है।

श्रीमद्भगवद्गीता : परम्परा, प्रभावः वैश्विकसांस्कृतिकसमन्वयश्च

श्रीमद्भगवद्गीता वेदादिशास्त्राणां सारः मन्यते। मानवजीवनस्य विविधपक्षान् सार्थकत्वं च ज्ञातुम् श्रीमद्भगवद्गीता अनुपमः अद्वितीयः चिरस्थायी प्रेरणाग्रन्थो वर्तते। भारतीयज्ञानपरम्परायां श्रीमद्भगवद्गीतायाः सिद्धान्ताः यथावश्यकं विश्वस्य दार्शनिकं साहित्यिकम् आध्यात्मिकं चिन्तनं च प्रभावितवन्तः, तथा यथावश्यकं दिशः च प्रदत्तवन्तः। वर्तमानवैश्विकसमाजे नानासमस्याः, अव्यवस्थाः, अनुचितः उपभोक्तृवादः, अनावश्यकप्रतिस्पर्धाः च सार्वजनिकजीवने लोकसंग्रहस्य भावनां नाशयन्त्यः दृश्यन्ते। अस्यां परिस्थितौ विश्वस्य विविधसंस्कृतिषु समुदायेषु राष्ट्रेषु च मध्ये पारस्परिकसद्भावनाः न दृश्यन्ते। अतः वैश्विकशान्तिस्थापनायै गीतासिद्धान्ताः नितराम् आवश्यकाः। श्रीमद्भगवद्गीतायाः कर्मयोगः, समदर्शिता, सर्वभूतहितभावः, समत्वम्, आत्मसंयमादयो नाना सिद्धान्ताः पूर्वापेक्षया अत्यधिकं प्रासङ्गिकाः, येन खलु वयं विश्वसांस्कृतिकसमन्वयं स्थापितुं शक्नुमः।

श्रीमद्भगवद्गीताया: परम्परा भारतीय दर्शनञ्च

श्रीमद्भगवद्गीता वेदेषु, उपनिषत्सु योगपरम्परायां च विभिन्नरूपेण प्रवहमानस्य भारतीयचिन्तनस्य सरलः, स्पष्टः समन्वितश्च स्वरूपविशेषः अस्ति। भगवान् श्रीकृष्णः अर्जुनं कथयति यत् इदं योगशास्त्रं मया सर्वप्रथमं सूर्याय कथितम्, सूर्येण स्वपुत्राय वैवस्वताय, वैवस्वतेन मनवे, मनुना च इक्ष्वाकवे कथितम्। एवं परम्परया प्राप्तमिदं योगशास्त्रं कालान्तरेण प्रायः लुप्तप्रायम् जातम् ; अतः अहं त्वां प्रति पुनः तदेवशास्त्रं कथयामि।यथा—

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।। — भगवद्गीता 4.1-2

भारतीयदार्शनिकपरम्परायां गीता प्रस्थानत्रयस्य प्रमुखतमेष्वेकम् अङ्गम् स्वीक्रियते। उपनिषदः, ब्रह्मसूत्राणि भगवद्गीता चैतत्त्रयमपि भारतीयदार्शनिकस्य वेदान्तीयचिन्तनस्य च दृढमाधार: मन्यन्ते। भारतीयदार्शनिकचिन्तने गीताध्ययनस्य परम्परा अत्यन्तं विस्तृता विद्यते। आदिशङ्कराचार्यत: समारभ्य रामानुजाचार्यः, मध्वाचार्यः, निम्बार्काचार्यः, वल्लभाचार्यः तथा आधुनिककाले स्वामी विवेकानन्दः, लोकमान्यतिलकः, महात्मा गान्धी, श्रीअरविन्दश्च स्वस्वदार्शनिकदृष्ट्या गीतायाः व्याख्यां कृतवन्तः।
श्रीमद्भगवद्गीतायाः प्रभावः
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीयज्ञानपरम्परायाः सा धारा विद्यते यया सहस्राब्देभ्यः भारतीयदर्शनम्, धर्म:, साहित्यम्, संस्कृति: च प्रभाविता। गीतायाः कर्मयोगः व्यक्तिं निष्क्रियतायाः रक्षति; ज्ञानयोगः तस्मै विवेकं प्रददाति; भक्तियोगः तं समर्पणस्य करुणायाश्च मार्गे नयति; समत्वं तस्य मानसिकं सन्तुलनं सन्मार्गे नयति; लोकसंग्रहश्च तं सामाजिकोत्तरदायित्वेन सह संयोजयति।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।— भगवद्गीता 2.47
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। — भगवद्गीता 2.48
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि। भगवद्गीता 3.20
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। भगवद्गीता 3.21
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।- भगवद्गीता 6.5

एते सिद्धान्ताः आधुनिकनेतृत्वे, प्रशासने, शिक्षायां सार्वजनिकजीवने च अत्यन्तं प्रभावकारिणः सन्ति। श्रीकृष्णार्जुनयोः संवादः व्यापके मानवीयसङ्कटे प्रतिकूलपरिस्थितिषु च ज्ञानपूर्वकं स्वकर्तव्यस्य पालनाय प्रेरणां ददाति।
गीतायाः प्रभावः धार्मिकक्षेत्रादपि अत्यन्तं व्यापकः अस्ति। तत्र निहितं जीवनदर्शनं विश्वस्य दार्शनिकानां, राजनीतिज्ञानां, वैज्ञानिकानां साहित्यकाराणां च चिन्तनं दृष्टिकोणं च गभीररूपेण प्रभावयति । गीतायाः वैश्विकप्रासङ्गिकतायाः आधाराः तस्याः सार्वभौमिकाः मानवीयाः प्रश्नाः सन्ति, यथा - मनुष्यः कः? तस्य कर्तव्यं किम्? कर्मणः परिणामस्य च सम्बन्धः कः? दुःखात् मुक्तिः कथं प्राप्यते? नैतिकनिर्णयः कथं करणीयः? मनः कथं नियन्त्रयितव्यम्? एते प्रश्नाः न कस्यापि एकस्य धर्मस्य समाजस्य वा संस्कृतेः सीमायां बद्धाः सन्ति अपितु समग्रं विश्वमेव चिन्तनपथि आनयन्ति ।
महात्मगान्धिवर्याय गीता नैतिकशक्तेः स्तम्भरूपेण, ओपेनहाइमर महोदयाय वैज्ञानिकदायित्वचिन्तनस्य स्रोतोरूपेण, लोकमान्यतिलकाय तथा डॉ. एपीजे अब्दुलकलाममहोदयाय च निष्कामकर्मणः राष्ट्रकल्याणस्य च प्रेरणारूपेण, एमर्सनाय थोरोवे कृते च साहित्यिकप्रेरणारूपेण, हेसे-हक्सलेयोः दार्शनिकचिन्तनस्य आधाररूपेण, सुनीता विलियम्स कृते च अन्तरिक्षपर्यन्तं नीतस्य आध्यात्मिकसन्देशस्य रूपेण गीता सततं सहचरी इव अभवत्।
श्रीमद्भगवद्गीतायाः अयमद्भुतः प्रभावः विद्यते यत् सा प्रतियुगं युगानुगुणं मानवजीवनं प्रभावयति। मानवेन सह संवादं स्थापयति स्थापयिष्यति च। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुलकलामस्य शब्देषु— “गीतायाः शिक्षाः सार्वकालिकाः सदैव च प्रासङ्गिकाः सन्ति।”
श्रीमद्भगवद्गीता वैश्विकसांस्कृतिकसमन्वयः च
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीयपरम्परायाः वैश्विकाधुनिकतायाश्च मध्ये सांस्कृतिकसेतुरूपेण तिष्ठति। तस्याः समन्वयकारी सन्देशः अस्मान् स्मारयति यत् वैश्विकसंस्कृतेः वास्तविकसौन्दर्यं विविधताविनाशे न निहितमपितु विभिन्नपरम्पराणां संवादे, सह-अस्तित्वे परस्परसमादरे च निहितम् अस्ति। अस्मिन् सन्दर्भे गीतायाः दृष्टिः महत्त्वपूर्णा अस्ति, यतः सा व्यक्तिं स्वधर्मानुरूपं कर्म कर्तुं प्रेरयति—

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। भगवद्गीता 3.35

आधुनिकसांस्कृतिकविमर्शे अस्य सिद्धान्तस्य अयमर्थ: कर्तुं शक्यते यत् स्वकीयसांस्कृतिकपरिचयस्य सम्मानं तथा अन्यान् प्रति सहिष्णुतायाः भाव: स्थापनीय:।
“वसुधैव कुटुम्बकम्” इति प्रसिद्धो भावः महोपनिषदा सह सम्बद्धः अस्ति तथा च गीतायाः सर्वभूतहितस्य समदर्शितायाश्च शिक्षाः व्यापकभारतीयविश्वदृष्ट्या सह संवादं स्थापयन्ति। गीतायाम् उक्तम्—

सर्वभूतहिते रताः।- भगवद्गीता 5.25

अर्थात् ये सर्वेषां प्राणिनां हिताय संलग्नाः भवन्ति ते उच्चस्तरीयाम् आध्यात्मिकीं स्थितिं प्राप्नुवन्ति। एष विचारः आधुनिकविश्वे मानवकेन्द्रितदृष्टेः अग्रतो भूत्वा सर्वभूतकल्याणस्य दिशायां चिन्तनं विकसितुं सहायो भवति। ।

सम्मेलनस्य परिकल्पना

श्रीमद्भगवद्गीता भारतीयज्ञानपरम्परायाम् अद्भुतं स्थानं धारयति। अस्मिन् सम्मेलने भारतीय-अध्यात्मस्य श्रीमद्भगवद्गीतायाश्च शिक्षाः वैश्विकविमर्शस्य विषयेषु प्रतिष्ठापिताः भविष्यन्ति इति अपेक्ष्यते। एवञ्च सांस्कृतिकनैतिकताया अध्यात्मस्य तुलनात्मकदर्शनस्य च विविधक्षेत्रेषु संवादवृद्धिर्भविष्यति इति सुनिश्चितं सम्भाव्यते I
सम्मेलनस्य मुख्योद्देश्यं श्रीमद्भगवद्गीतायाः सार्वभौमिक-सार्वकालिक-मानवकल्याणस्य सिद्धान्तानां वैश्विकपटले स्थापनं तथा विश्वसंस्कृतिषु परस्परं चिन्तनं मननं संवादवृद्धिश्च विद्यते I